यह कहानी यीशु ने एक व्यवस्थापक को जवाब देते हुए सुनाई थी, जिसने यीशु से पूछा था कि वह अनन्त जीवन का वारिस होने के लिए क्या करे। यीशु ने जवाब में उसे परमेश्वर के नियम याद दिलाए कि वह परमेश्वर से और अपने पड़ोसी से प्रेम करे। तब व्यवस्थापक ने यीशु से यह सवाल किया:
“परन्तु उस ने अपने आप को धर्मी ठहराने की चाह में यीशु से पूछा, “और मेरा पड़ोसी कौन है?””[लूका 10:29]
इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए, यीशु ने यह दृष्टांत सुनाया:
एक आदमी यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था। यह रास्ता बहुत सुनसान और खतरनाक था। रास्ते में डाकुओं ने उसे घेर लिया, उसके कपड़े छीन लिए, उसे मारा-पीटा और अधमरा छोड़कर चले गए।
थोड़ी देर बाद, उसी रास्ते से एक याजक (Priest) जा रहा था। उसने घायल पड़े हुए आदमी को देखा, लेकिन वह सड़क के दूसरी ओर से निकल गया। उसने उस आदमी पर कोई दया नहीं दिखाई।
फिर, उसी मार्ग से एक लेवी (Levite) आया। लेवी भी यहूदियों के धार्मिक कार्यों में सेवा करते थे। उसने भी उस आदमी को देखा। वह उसके पास आया और उसे जांचा, लेकिन फिर वह भी दूसरी तरफ से होकर चला गया। उन दोनों ने उस मुसीबत में पड़े हुए अपने ही देश के भाई की मदद नहीं की।
इसके बाद, एक सामरी (Samaritan) उधर से निकला। यहूदी और सामरी आमतौर पर एक-दूसरे से नफ़रत करते थे और आपस में कोई व्यवहार नहीं रखते थे। लेकिन जब सामरी ने उस घायल आदमी को देखा, तो उसका हृदय करुणा से भर गया।
उस भले सामरी ने नीचे उतरकर उस घायल आदमी के घावों पर तेल और दाखरस (वाइन) लगाया और उन्हें पट्टियों से बांधा। फिर उसने उस आदमी को अपने जानवर पर लादा, और एक सराय (Inn) में ले गया और उसकी देखभाल की।
अगले दिन, सामरी ने सराय के मालिक को दो दीनार (चांदी के सिक्के) दिए और कहा, “इसकी देखभाल करना, और जो कुछ तेरा इस पर और खर्च होगा, वह मैं लौटने पर तुझे चुका दूँगा।”
जब यीशु ने यह कहानी पूरी की, तब उन्होंने व्यवस्थापक से पूछा, “तेरा क्या विचार है, इन तीनों में से उस पर जो डाकुओं के हाथ में पड़ा था, पड़ोसी कौन ठहरा?”
व्यवस्थापक ने जवाब दिया, “वह जिसने उस पर दया की।”
यीशु ने उससे कहा:
“जा, तू भी ऐसा ही कर।” [लूका 10:37]
यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारा पड़ोसी वह नहीं है जो हमारी जाति या धर्म का है, बल्कि वह हर व्यक्ति है जो संकट में है और जिसे हमारी मदद की ज़रूरत है। यीशु मसीह की शिक्षा है कि हमें बिना किसी भेदभाव के हर किसी पर दया करनी चाहिए।
