बाइबल और विश्वास की यात्रा
यह कहानी 19वीं शताब्दी के मध्य में शुरू होती है, जब जर्मनी के बर्लिन शहर में पादरी जोहान्स गोस्नर (Johannes Gossner) का हृदय भारत, विशेषकर छोटानागपुर (आज का झारखंड) की आत्माओं के लिए धड़कता था। वह एक ऐसे मिशनरी थे जिनका मानना था कि परमेश्वर अपनी प्रार्थनाओं का उत्तर देंगे, भले ही शुरुआत में कोई सफलता न दिखे।
1845: विश्वास का बीज बोना
गोस्नर की प्रार्थनाओं का परिणाम चार युवा मिशनरियों – एमिल शैट्ज़ (Emil Schatz), फ्रेडरिक बात्श (Frederick Batsch), ऑगस्टस ब्रांट (Augustus Brandt), और ई. ज़ेड. रेनाटस (E. Z. Renatus) के रूप में सामने आया। ये चारों 1845 में राँची पहुँचे। उनका लक्ष्य “केवल मसीह और क्रूसित मसीह का प्रचार” करना था, जैसा कि बाइबल के 1 कुरिंथियों 2:2 में लिखा है।
छोटानागपुर की भूमि पर पहला बीज बोना आसान नहीं था। अगले पाँच साल तक उनकी अथक मेहनत और प्रार्थना के बावजूद, किसी भी व्यक्ति ने बपतिस्मा नहीं लिया। मिशनरियों ने निराशा में वापस लौटने का विचार कर लिया था।
1850: प्रार्थना का उत्तर
कहते हैं कि जब विश्वास सबसे अधिक डगमगाता है, तभी परमेश्वर कार्य करते हैं। 1850 में, छोटानागपुर के चार उराँव युवकों – केशव, बंधु, घुरन और बोधन – ने आकर यीशु मसीह के नाम में बपतिस्मा लेने की इच्छा व्यक्त की। यह चर्च के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। यह घटना उस वचन की पुष्टि करती है जो मत्ती 7:7 में लिखा है: “मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा।” इन चार लोगों ने छोटानागपुर में गोस्नर मिशन की नींव रखी।
विस्तार और बाइबल का केंद्र
इन शुरुआती बपतिस्मा के बाद, चर्च तेजी से बढ़ा, खासकर छोटानागपुर के आदिवासी समुदायों (उराँव, मुंडा, खड़िया) के बीच। मिशनरियों ने केवल धर्मोपदेश ही नहीं दिया, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के लिए भी काम किया।
- शिक्षा: मिशन ने कई स्कूल खोले, जिससे बाइबल और शिक्षा का ज्ञान स्थानीय भाषाओं में फैल सका।
- बाइबल अनुवाद: स्थानीय भाषाओं को समझने और उनमें प्रचार करने पर जोर दिया गया, ताकि मसीह का संदेश हर किसी के दिल तक पहुँचे।
असम की यात्रा: विश्वास का विस्तार
यह चर्च केवल छोटानागपुर तक सीमित नहीं रहा। 19वीं सदी के अंत में, जब छोटानागपुर के कई लोग काम की तलाश में असम के चाय बागानों में गए, तो वे अपने साथ अपनी बाइबल और अपना विश्वास भी ले गए। इस तरह, छोटानागपुर के मसीही समुदाय ने ही असम में GELC की एक नई शाखा स्थापित की, जो दर्शाता है कि कलीसिया केवल एक इमारत नहीं, बल्कि विश्वासियों का एक गतिशील समूह है।
विरासत और आत्म-निर्भरता
1914 के प्रथम विश्व युद्ध और उसके बाद की राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान, जर्मन मिशनरियों को लौटना पड़ा। उस कठिन समय में, स्थानीय मसीहियों ने अपने विश्वास और चर्च को स्वयं संभाला। आखिरकार, 1919 में यह चर्च एक पूरी तरह से भारतीय, आत्म-निर्भर और स्वतंत्र संस्था बन गया, जिसे “गोस्नर इवेंजेलिकल लूथरन चर्च” (GELC) के नाम से जाना जाता है।
आज भी, यह चर्च यीशु मसीह के महान आदेश (मत्ती 28:19-20) के अनुसार कार्य कर रहा है: “तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ…” यह चर्च छोटानागपुर और असम में लाखों लोगों के लिए विश्वास, शिक्षा और सेवा का एक मजबूत स्तंभ बना हुआ है।
