याकूब इब्राहीम, इसहाक और याकूब—इन तीन महान कुलपतियों में से एक हैं, जिनकी कहानी उत्पत्ति (Genesis) की किताब में है।
याकूब बाइबिल में एक केंद्रीय व्यक्ति हैं, जो इसहाक और रिबका के पुत्र थे, और बाद में उनका नाम बदलकर इज़राइल रखा गया। इज़राइल के 12 गोत्र उन्हीं के नाम पर रखे गए थे।
1. जन्म और जन्मसिद्ध अधिकार की बिक्री (उत्पत्ति 25:20-34)
इसहाक और रिबका के दो जुड़वाँ पुत्र हुए—एसाव और याकूब। एसाव पहले पैदा हुए, इसलिए उन्हें जन्मसिद्ध अधिकार (Birthright) प्राप्त था।
- व्यक्तित्व: एसाव शिकारी थे और खुले मैदान में रहने वाले थे, जबकि याकूब शांत स्वभाव के थे और तम्बुओं में रहते थे।
- जन्मसिद्ध अधिकार: एक दिन एसाव बहुत थके-हारे और भूखे जंगल से लौटे। याकूब दाल (पायसम) पका रहे थे। एसाव ने याकूब से दाल मांगी। याकूब ने कहा कि वह उन्हें दाल तभी देंगे जब एसाव अपना जन्मसिद्ध अधिकार उन्हें बेच दें। एसाव ने एक पल की भूख के लिए भविष्य के अपने सभी अधिकार (जन्मसिद्ध अधिकार) बेच दिए। इस प्रकार, याकूब ने चालाकी से एसाव का बड़ा अधिकार ले लिया।
2. आशीष चुराना (उत्पत्ति 27:1-45)
जब इसहाक बूढ़े हो गए और उनकी आँखों की रोशनी कम हो गई, तो उन्होंने एसाव को अपने पास बुलाया ताकि वह उन्हें बड़ी आशीष दे सकें।
- रिबका की योजना: रिबका ने यह बात सुन ली। वह याकूब से अधिक प्रेम करती थीं। उन्होंने याकूब से कहा कि वह एसाव का भेष बदलकर, बकरियों के बच्चों की खाल हाथों और गर्दन पर बाँधकर, इसहाक के पास जाएँ।
- धोखा और आशीष: याकूब एसाव के कपड़े पहनकर, रिबका के बनाए भोजन के साथ अपने पिता के पास गए। इसहाक ने आवाज़ से पहचान लिया कि यह याकूब है, लेकिन हाथों की खाल और कपड़ों की खुशबू से उन्हें विश्वास हो गया कि यह एसाव है। इसहाक ने याकूब को बड़े पुत्र की आशीष दे दी।
- एसाव का क्रोध: जैसे ही याकूब आशीष लेकर निकले, एसाव शिकार से लौटे। जब उन्हें पता चला कि याकूब ने उन्हें धोखा देकर उनकी आशीष भी चुरा ली है, तो वह बहुत क्रोधित हुए और याकूब को जान से मारने की योजना बनाने लगे।
3. लाबान के पास पलायन और विवाह (उत्पत्ति 28-31)
एसाव के डर से, याकूब अपनी माँ की सलाह पर अपने मामा लाबान के पास भाग गए।
- सेवा और विवाह: याकूब को लाबान की छोटी बेटी राहेल से प्रेम हो गया। लाबान ने कहा कि उन्हें राहेल से विवाह करने के लिए सात साल तक सेवा करनी होगी। जब सात साल पूरे हुए, तो लाबान ने धोखे से बड़ी बेटी लिआह का विवाह याकूब से कर दिया। याकूब को राहेल से विवाह करने के लिए सात साल और सेवा करनी पड़ी।
- परिवार: याकूब ने लिआह, राहेल, और उनकी दासियों—बिल्हा और ज़िल्पा—से विवाह किया, और उनके 12 पुत्र (जो इज़राइल के 12 गोत्रों के कुलपति बने) और एक पुत्री (दीना) का जन्म हुआ।
4. परमेश्वर के साथ कुश्ती (उत्पत्ति 32:22-32)
बीस साल बाद, लाबान के यहाँ से धन-सम्पत्ति लेकर याकूब अपने देश लौटने लगे। उन्हें एसाव से सामना होने का डर था।
- नाम बदलना: रात के समय, जब याकूब अकेले थे, तो एक पुरुष ने आकर भोर होने तक उनसे कुश्ती की। वह पुरुष वास्तव में परमेश्वर का दूत था। जब वह पुरुष याकूब को हरा नहीं सका, तो उसने याकूब की जांघ की नस पर चोट की। याकूब ने उसे तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि उसने याकूब को आशीष न दे दी।
- इज़राइल: दूत ने उनसे पूछा, “तेरा नाम क्या है?” उन्होंने कहा, “याकूब।” तब दूत ने कहा, “तेरा नाम अब से याकूब नहीं, बल्कि इज़राइल होगा, क्योंकि तूने परमेश्वर और मनुष्यों से युद्ध किया है और विजयी हुआ है।” याकूब ने उस स्थान का नाम पनीएल (अर्थात: परमेश्वर का मुख) रखा।
5. एसाव से मेल-मिलाप (उत्पत्ति 33)
जब याकूब और एसाव मिले, तो एसाव का क्रोध शांत हो चुका था। उन्होंने एक दूसरे को गले लगाया और मेल-मिलाप हो गया। इस तरह याकूब का जीवन धोखे से शुरू होकर, परमेश्वर के साथ संघर्ष और आशीष के बाद इज़राइल नामक एक नए पहचान पर समाप्त हुआ, जहाँ से इज़राइल राष्ट्र की शुरुआत हुई।
