यीशु मसीह का जन्म लगभग 2000 साल पहले, यहूदिया प्रांत के बैतलहम नामक नगर में हुआ था। यह घटना दुनिया के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जाती है और बाइबिल के नए नियम की शुरुआत करती है।
1. स्वर्गदूत का संदेश (मरियम और यूसुफ को)
मरियम को घोषणा (लूका 1:26-38): नासरत शहर में मरियम नाम की एक कुँवारी लड़की रहती थी, जिसकी सगाई यूसुफ नामक एक बढ़ई से हुई थी, जो राजा दाऊद के वंश से था। एक दिन, परमेश्वर ने स्वर्गदूत गाब्रिएल को मरियम के पास भेजा। स्वर्गदूत ने मरियम से कहा, “आनंद कर! तुझ पर परमेश्वर का बड़ा अनुग्रह हुआ है। तू गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी, और तू उसका नाम यीशु रखना। वह महान होगा और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा, और वह हमेशा तक राजा होकर राज करेगा।” मरियम ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि यह कैसे होगा, क्योंकि वह तो कुँवारी है। स्वर्गदूत ने उत्तर दिया कि यह पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से होगा।
यूसुफ का स्वप्न (मत्ती 1:18-25): जब यूसुफ को पता चला कि मरियम गर्भवती है, तो उसने चुपचाप उसे त्यागने का विचार किया, क्योंकि वह एक धर्मी पुरुष था और उसे शर्मिंदा नहीं करना चाहता था। तब, प्रभु का एक स्वर्गदूत स्वप्न में यूसुफ के सामने प्रकट हुआ और कहा, “हे यूसुफ, दाऊद की संतान, तू अपनी पत्नी मरियम को अपने यहाँ ले आने से मत डर, क्योंकि जो उसके गर्भ में है, वह पवित्र आत्मा की ओर से है। वह एक पुत्र जनेगी, और तू उसका नाम यीशु रखना, क्योंकि वह अपने लोगों को उनके पापों से उद्धार देगा।” यूसुफ जाग उठा और प्रभु के दूत की आज्ञा मानकर मरियम को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।
2. बैतलहम की यात्रा और जन्म
जनगणना का आदेश (लूका 2:1-5): उन्हीं दिनों, रोम के सम्राट औगुस्तुस कैसर ने यह आज्ञा निकाली कि पूरे साम्राज्य में जनगणना की जाए। हर व्यक्ति को अपना नाम लिखवाने के लिए अपने पैतृक नगर जाना था। चूँकि यूसुफ दाऊद के घराने और वंश का था, इसलिए वह गलील के नासरत नगर से यहूदिया में दाऊद के नगर बैतलहम को गया। वह अपनी मंगेतर मरियम के साथ गया, जो उस समय गर्भवती थी।
चरनी में जन्म (लूका 2:6-7): जब वे बैतलहम में थे, तो मरियम के प्रसव का समय आ गया। चूंकि सराय (Inn) में उनके लिए कोई जगह नहीं थी, इसलिए उन्होंने जानवरों के अस्तबल में शरण ली। वहीं, मरियम ने अपने पहलौठे पुत्र को जन्म दिया। उसने शिशु को कपड़ों में लपेटा और उसे एक चरनी (Manger) में लिटा दिया, जो जानवरों के चारा खाने का पात्र होता है। इस प्रकार, जगत के उद्धारकर्ता का जन्म एक अत्यंत साधारण और दीन स्थान पर हुआ।
3. चरवाहों को शुभ समाचार
स्वर्गदूतों का आगमन (लूका 2:8-14): उसी रात, बैतलहम के पास के खेतों में कुछ चरवाहे अपने भेड़ों के झुंड की रखवाली कर रहे थे। अचानक प्रभु का एक स्वर्गदूत उनके सामने खड़ा हुआ, और उनके चारों ओर प्रभु का तेज़ चमक उठा। वे बहुत डर गए। स्वर्गदूत ने उनसे कहा, “डरो मत, देखो, मैं तुम्हें बड़े आनंद का सुसमाचार सुनाता हूँ, जो सब लोगों के लिए होगा। क्योंकि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिए एक उद्धारकर्ता जन्मा है, जो मसीह प्रभु है। और तुम्हारे लिए यह चिन्ह है कि तुम एक बालक को कपड़ों में लिपटा हुआ और चरनी में लेटा पाओगे।”
तुरंत ही, उस स्वर्गदूत के साथ बहुत से और स्वर्गदूत प्रकट हुए, जो परमेश्वर की स्तुति करते हुए कह रहे थे, “आकाश में परमेश्वर की महिमा और पृथ्वी पर उन मनुष्यों में शांति, जिनसे वह प्रसन्न है।”
चरवाहों का दर्शन: स्वर्गदूतों के चले जाने के बाद, चरवाहे तुरंत बैतलहम गए और उन्होंने मरियम, यूसुफ और चरनी में लेटे हुए बालक यीशु को देखा। उन्होंने वह सब कुछ बताया जो स्वर्गदूत ने उनसे कहा था। जो कुछ उन्होंने देखा और सुना था, उसके लिए परमेश्वर की स्तुति और बड़ाई करते हुए वे वापस लौट गए।
4. नामकरण और आगे की घटनाएँ
नाम यीशु: आठवें दिन, जब बालक के खतने का समय आया, तो उसका नाम यीशु रखा गया। यह वही नाम था जो उसके गर्भ में आने से पहले स्वर्गदूत ने बताया था।
ज्योतिषियों का आगमन (मत्ती 2:1-12): यीशु के जन्म के कुछ समय बाद, पूर्व दिशा से कुछ ज्योतिषी (या ज्ञानी पुरुष) यरूशलेम आए। उन्होंने पूछा, “यहूदियों का वह राजा कहाँ है जिसका जन्म हुआ है? क्योंकि हमने पूर्व में उसका तारा देखा है और हम उसे प्रणाम करने आए हैं।” वे राजा हेरोदेस से मिले, जिसने बैतलहम में जाकर बालक को खोजने के लिए उनसे कहा। ज्योतिषियों ने उस तारे का पीछा किया, जो उन्हें बैतलहम में उस घर तक ले गया जहाँ यीशु था। उन्होंने घर में प्रवेश किया, बालक को उसकी माता मरियम के साथ देखा, और गिरकर उसे प्रणाम किया। उन्होंने अपने बहुमूल्य उपहार—सोना, लोबान और गन्धरस—उसे भेंट किए। स्वप्न में परमेश्वर से चेतावनी पाकर कि हेरोदेस के पास वापस न जाएँ, वे दूसरे मार्ग से अपने देश को लौट गए।
