परिचय: यीशु का ‘प्रिय शिष्य’
बाइबिल में, यूहन्ना (Yuhanna) सबसे महत्वपूर्ण और पूजनीय प्रेरितों (Apostles) में से एक हैं। वह बारह शिष्यों में सबसे कम उम्र के थे और उन्हें अक्सर “वह शिष्य जिससे यीशु प्रेम करते थे” कहा जाता है। यूहन्ना अपने भाई याकूब (James) के साथ ज़ेबेदी (Zebedee) के पुत्र थे, और वे पेशे से मछुआरे थे।
यीशु ने यूहन्ना और याकूब को “बोजानर्गिस” (Boanerges) यानी ‘गरज के पुत्र’ की उपाधि दी थी, संभवतः उनके उत्साही और जोशीले स्वभाव के कारण। यूहन्ना का जीवन, यीशु के साथ उनके गहन व्यक्तिगत संबंध और उनके बाद के प्रभावशाली लेखन के कारण विशेष महत्व रखता है।
1. यीशु के साथ घनिष्ठता
यूहन्ना को यीशु के तीन सबसे नज़दीकी शिष्यों—पतरस (Peter), याकूब और यूहन्ना—में गिना जाता है। वह कई महत्वपूर्ण घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे जहाँ केवल इन तीनों को ही उपस्थित रहने की अनुमति थी:
याईर की बेटी को जिलाना: (मरकुस 5:37)
रूपांतरण (Transfiguration): जहाँ यीशु का तेज और महिमा प्रकट हुई। (मरकुस 9:2)
गेतसमनी का दुख: (मरकुस 14:33)
यूहन्ना सुसमाचार में, वह स्वयं को नाम से नहीं पुकारते, बल्कि बार-बार “वह शिष्य जिससे यीशु प्रेम करते थे” के रूप में संदर्भित करते हैं (यूहन्ना 13:23)। यह उपाधि उनकी यीशु के प्रति व्यक्तिगत भक्ति और यीशु के प्रति उनके प्रेम की गहराई को दर्शाती है।
2. सूली पर चढ़ना और पुनरुत्थान
यूहन्ना एकमात्र प्रेरित थे जो यीशु के सूली पर चढ़ाए जाने के समय वहाँ मौजूद थे। जब अन्य शिष्य डर के मारे भाग गए थे, तब यूहन्ना यीशु की माता मरियम के साथ क्रूस के पास खड़े रहे।
अंतिम दायित्व: क्रूस पर से, यीशु ने अपनी माता मरियम को यूहन्ना को सौंपा और यूहन्ना को मरियम की देखभाल का दायित्व दिया। (यूहन्ना 19:26-27)
पुनरुत्थान के बाद भी यूहन्ना एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। वह पतरस के साथ खाली कब्र पर सबसे पहले दौड़कर गए थे और देखकर विश्वास करने वाले पहले शिष्यों में से एक थे। (यूहन्ना 20:2-8)
3. प्रारंभिक कलीसिया में भूमिका
प्रेरितों के काम (Acts) की पुस्तक बताती है कि पुनरुत्थान और पवित्र आत्मा के आने के बाद, यूहन्ना, पतरस के साथ प्रारंभिक कलीसिया (Church) के दो प्रमुख स्तंभों में से एक थे।
चमत्कार: उन्होंने पतरस के साथ मिलकर मंदिर के सुंदर फाटक पर एक लंगड़े व्यक्ति को चंगा किया, जिसके बाद उन्हें अधिकारियों द्वारा धमकी भी दी गई। (प्रेरितों के काम 3:1-10)
साहस: वह और पतरस, यहूदी महासभा के सामने निडरता से यीशु के पुनरुत्थान की गवाही देते रहे। (प्रेरितों के काम 4:1-22)
4. यूहन्ना के लेखन कार्य (पांच पुस्तकें)
यूहन्ना को बाइबिल में कुल पाँच पुस्तकों का लेखक माना जाता है, जो उनके धर्मशास्त्र (Theology) की गहराई को दर्शाती हैं:
यूहन्ना का सुसमाचार (Gospel of John): यह यीशु के जीवन का सबसे आध्यात्मिक विवरण है। यह यीशु को “वचन” (Logos) और परमेश्वर के पुत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। इस पुस्तक की शुरुआत “आदि में वचन था…” से होती है।
यूहन्ना का पहला पत्र (1 John): यह प्रेम (Love), सत्य (Truth) और आज्ञाकारिता (Obedience) के विषय पर केंद्रित है, जिसमें कहा गया है कि “परमेश्वर प्रेम है।”
यूहन्ना का दूसरा पत्र (2 John): यह कलीसिया को सत्य में चलने की शिक्षा देता है।
यूहन्ना का तीसरा पत्र (3 John): यह कलीसिया के भीतर आतिथ्य और विश्वासयोग्य सेवा को प्रोत्साहित करता है।
प्रकाशितवाक्य (Revelation): यह बाइबिल की अंतिम पुस्तक है। यह भविष्य की घटनाओं, मसीह की महिमामय वापसी और नए स्वर्ग और नई पृथ्वी के दर्शनों का वर्णन करती है। यूहन्ना ने यह पुस्तक पात्मोस द्वीप पर निर्वासन के दौरान लिखी थी।
5. विरासत और मृत्यु
परंपरा के अनुसार, प्रेरित यूहन्ना प्रारंभिक कलीसिया के अंतिम जीवित प्रेरित थे। उनका अधिकांश जीवन इफिसुस (Ephesus) में बीता। उनके लंबे जीवन ने उन्हें मसीह के व्यक्तिगत शिक्षण को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का मौका दिया।
माना जाता है कि बुढ़ापे में यूहन्ना को रोमी सम्राट डोमिटियन (Domitian) द्वारा पात्मोस द्वीप पर निर्वासित किया गया था, जहाँ उन्होंने प्रकाशितवाक्य की पुस्तक लिखी। उन्हें प्राकृतिक रूप से मरने वाले एकमात्र प्रेरित माना जाता है, जबकि अन्य सभी को मसीह के लिए शहीद होना पड़ा।
यूहन्ना का जीवन प्रेम, वफादारी और परमेश्वर के पुत्र की महिमा के दर्शन का एक सशक्त उदाहरण है। उनके लेखन ने मसीही विश्वास के प्रमुख सिद्धांतों की नींव रखी है।
संदर्भ: यूहन्ना का सुसमाचार, प्रेरितों के काम, और प्रकाशितवाक्य
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