बाइबिल सृष्टि कथा का सारांश (उत्पत्ति १-२)
परमेश्वर ने छह दिनों में सृष्टि रची और सातवें दिन विश्राम किया:
- पहला दिन: उजियाला रचा → दिन और रात।
- दूसरा दिन: आकाश बनाया → जल ऊपर-नीचे बँटे।
- तीसरा दिन: सूखी भूमि, समुद्र, वनस्पति (घास, पेड़, फल)।
- चौथा दिन: सूर्य, चंद्रमा, तारे → दिन-रात के चिह्न।
- पाँचवाँ दिन: समुद्री जीव, पक्षी।
- छठा दिन:
- स्थलीय पशु।
- मनुष्य (आदम और हव्वा) को अपनी समानता में रचा।
- उन्हें धरती पर प्रभुता दी।
- सातवाँ दिन: सृष्टि पूर्ण → परमेश्वर ने विश्राम किया और इसे पवित्र ठहराया।
केंद्रीय संदेश: “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की… और देखा कि यह बहुत अच्छा है।” (उत्पत्ति १:१, ३१)
बाइबिल के अनुसार सृष्टि की कथा
आरंभ में, जब कुछ भी नहीं था—न आकाश, न पृथ्वी, न समय का कोई चिह्न—केवल अंधकार और शून्य था। उस शून्य में परमेश्वर का आत्मा गतिमान था, जैसे सागर पर हवा की पहली साँस। तब परमेश्वर ने कहा, “उजियाला हो!” और उजियाला हो गया। उस उजाले को देखकर परमेश्वर मुस्कुराए; उन्होंने उसे दिन कहा, और अंधकार को रात। यह पहला दिन था—सृष्टि का प्रथम स्पंदन।
दूसरे दिन परमेश्वर ने जल के ऊपर एक विशाल मेहराब रचा, जैसे नीला कैनवास आकाश बन गया। जल दो भागों में बँट गए—ऊपर बादल बनकर उड़ने लगे, नीचे समुद्र बनकर लहराने लगे। आकाश की नीली छतरी में सूरज की पहली किरणें झाँकने लगीं।
तीसरे दिन परमेश्वर ने धरती को आवाज दी। “सूखी भूमि उभर आए!” और देखते-ही-देखते समुद्र सिमट गए, हरी-भरी भूमि प्रकट हुई। परमेश्वर ने कहा, “हरियाली फैलो!” तो घास के हरे कालीन बिछ गए, फूलों की रंग-बिरंगी चादरें लहराने लगीं, और वृक्षों ने अपने मजबूत हाथ आकाश की ओर उठाए। आम के पेड़ों पर मीठे फल लटकने लगे, नारियल की छाँव ठंडी हवा देने लगी। परमेश्वर ने यह सब देखा और कहा, “कितना सुंदर!”
चौथे दिन परमेश्वर ने आकाश को सजाया। “प्रकाश के बड़े-बड़े दीपक जलें!” तो सूरज स्वर्णिम मुकुट पहनकर उगा, चंद्रमा चाँदी की थाली बनकर रात को रोशन करने लगा। तारे झिलमिलाते हीरे की तरह टँके गए—हर तारा एक कहानी, हर झिलमिल एक गीत। दिन को सूरज की गर्माहट, रात को चाँद की शीतलता—सब कुछ संतुलित, सब कुछ पूर्ण।
पाँचवें दिन परमेश्वर ने जल को जीवन दिया। “समुद्र में जीव-जंतु उभरें!” और मछलियाँ रंग-बिरंगी परियाँ बनकर तैरने लगीं। विशाल व्हेल ने गहरे नीले में गीत गाए, छोटी मछलियाँ चाँदी की चमक बिखेरती हुईं दौड़ने लगीं। फिर परमेश्वर ने आकाश को पंख दिए—चिड़ियों की चहचहाहट, बाज की ऊँची उड़ान, मोर की नीली पूँछ में इंद्रधनुष। हर प्राणी में परमेश्वर का प्रेम झलक रहा था।
छठे दिन परमेश्वर ने धरती को साथी दिए। “जंगल में पशु चलें!” तो हाथी की विशाल चाल, शेर की गरिमामयी दहाड़, खरगोश की नन्ही छलाँग—सब कुछ जीवंत हो उठा। फिर परमेश्वर ने अपने हाथों से मिट्टी गढ़ी, उसमें अपनी साँस फूँकी, और मनुष्य को जन्म दिया—आदम। परमेश्वर ने उसे बगीचे में रखा, जहाँ चार नदियाँ बहती थीं, सोने की मिट्टी चमकती थी। लेकिन आदम अकेला था। तब परमेश्वर ने उसकी पसली से हव्वा को रचा—सुंदर, कोमल, प्रेम से भरी। दोनों नग्न थे, मासूम थे, और परमेश्वर की उपस्थिति में आनंदित थे।
सातवाँ दिन आया। परमेश्वर ने सृष्टि को देखा—हर पत्ती पर ओस की बूँद, हर फूल में सुगंध, हर प्राणी में जीवन। उन्होंने कहा, “यह अति उत्तम है!” और विश्राम किया। सातवाँ दिन पवित्र हुआ—प्रेम का दिन, शांति का दिन।
इस प्रकार स्वर्ग और पृथ्वी पूरे हुए। परमेश्वर का प्रेम हर कोने में बसा, हर साँस में गूँजा। और आज भी, जब सूरज उगता है, जब चाँद मुस्कुराता है, जब फूल खिलते हैं—वही प्रेम गाता है: “देखो, मैंने तुम्हारे लिए एक घर बनाया है, जहाँ हर दिल में मेरा घर है।”
