दस कुंवारियों की कहानी
बहुत पुरानी बात है, एक छोटे से गाँव में जहां फूलों की महक और मधुर संगीत की ध्वनियाँ हवा में घुली रहती थीं, एक शानदार विवाह का उत्सव होने वाला था। दूल्हा, एक राजकुमार जैसा युवक, जो सबकी नजरों का केंद्र था, अपनी दुल्हन के लिए आ रहा था। लेकिन वह कब आएगा, यह कोई नहीं जानता था। गाँव की दस युवा कुंवारियाँ, जो दुल्हन की सहेलियाँ थीं, इस विवाह की रौनक में हिस्सा लेने के लिए चुनी गई थीं। वे सभी सुंदर थीं, चमकीले वस्त्रों में सजी हुईं, और हाथ में मशालें लिए हुए—जो रात के अंधेरे को चीरने वाली लालटेनें थीं।
इन दस कुंवारी लड़कियों में से पाँच बहुत समझदार थीं। उनका नाम था—माया, लीला, सूर्या, चंदा और रीता। वे जानती थीं कि विवाह की रात लंबी हो सकती है, इसलिए उन्होंने न सिर्फ अपनी मशालें जलाईं, बल्कि उनके साथ अतिरिक्त तेल की कुप्पियाँ भी ले लीं। “क्या पता दूल्हा देर से आए,” माया ने कहा, “हमारी मशालें बुझने न पाएँ।” वे हँसती-खेलती इंतजार करने लगीं, लेकिन आँखों में सतर्कता की चमक बनी रही।
बाकी पाँच कुंवारियाँ थोड़ी लापरवाह थीं। उनका नाम था—काजल, मीरा, रानी, सीमा और तारा। उन्होंने तो मशालें ले लीं, लेकिन तेल की कुप्पियों को भूल गईं। “अरे, तेल तो बाद में भी मिल जाएगा,” काजल ने हँसते हुए कहा। “दूल्हा तो जल्दी आ ही जाएगा!” वे गातीं-बजातीं, एक-दूसरे के साथ मजाक करतीं, लेकिन तैयारी की चिंता उनके मन में कहीं नहीं थी।
सूर्य डूबा, चाँद उगा, लेकिन दूल्हा नहीं आया। रात गहराती गई। ठंडी हवा में मशालों की लपटें नाचने लगीं। धीरे-धीरे थकान ने सब पर काबू पा लिया। समझदार कुंवारियाँ अपनी कुप्पियों को संभालते हुए झपकी लेने लगीं, और लापरवाह लड़कियाँ तो आधी रात तक सो ही गईं। गाँव की सड़कें शांत हो गईं, सिर्फ क्रिकेटों की टुनटुनाहट सुनाई दे रही थी।
तभी, आधी रात को, एक जोरदार ध्वनि गूँजी—जैसे कोई ताँबे का नगाड़ा बज रहा हो! “जागो! जागो! दूल्हा आ रहा है! मशालें जलाओ और चलो!” सारी कुंवारियाँ चौंककर उठीं। हड़बड़ी में उन्होंने अपनी मशालें ठीक करने की कोशिश की। लेकिन अरे! लापरवाह कुंवारियों की मशालें बुझ चुकी थीं। तेल खत्म हो गया था! काजल ने घबराते हुए मीरा से कहा, “बहन, तेरी कुप्पी से थोड़ा तेल दे दे। हमारी मशालें फिर से जल जाएँगी, वरना हम विवाह भवन में कैसे पहुँचेंगी?”
माया, जो सबसे समझदार थी, ने दुखी स्वर में उत्तर दिया, “नहीं बहन, हमारा तेल भी कम है। अगर हम बाँट दें, तो शायद हमारी मशालें भी बुझ जाएँ। जाओ, पास के बाजार में व्यापारियों के पास जाकर जल्दी से तेल खरीद लो। दूल्हा इंतजार नहीं करेगा।” यह कहते हुए समझदार कुंवारियाँ अपनी मशालें फिर से प्रज्वलित कर, दूल्हे की ओर दौड़ पड़ीं। उनकी लपटें रास्ते को रोशन कर रही थीं, और हँसी-खुशी की आवाजें गूँज रही थीं।
लेकिन लापरवाह कुंवारियाँ? वे तेल खरीदने बाजार की ओर भागीं। रास्ते में अंधेरा घना था, और ठंडी हवा उनके चेहरे पर चाबुक की तरह लग रही थी। जब वे लौटीं, तो विवाह भवन के द्वार पर पहुँचीं। वहाँ से संगीत की धुनें आ रही थीं, नृत्य की थापें गूँज रही थीं। समझदार कुंवारियाँ पहले ही अंदर पहुँच चुकी थीं, दूल्हे के साथ हँस-खेल रही थीं। द्वार बंद हो चुका था—एक मजबूत लकड़ी का दरवाजा, जो राजकुमार के आदेश पर सील कर दिया गया था।
काजल ने घबराहट से दरवाजा ठोकते हुए पुकारा, “हे दूल्हा जी! हे प्रभु! हमें अंदर आने दो! हम भी तुम्हारी सहेलियाँ हैं!” बाकी लड़कियाँ उसके साथ चिल्लाईं, “द्वार खोल दो! हम देर से आ गईं, लेकिन हम तैयार हैं!”
दूल्हे की आवाज़ अंदर से आई, ठंडी और दृढ़: “मैं सच कहता हूँ, मैं तुम्हें नहीं जानता। तुमने तैयारी नहीं की, अब देर हो चुकी है।”
कुंवारियाँ रोने लगीं। उनकी मशालें अब बेकार पड़ी थीं, और विवाह की रौनक उनके लिए बंद दरवाजे के पीछे रह गई। वे वहीं खड़ी रहीं, अंधेरे में, पछतावे की आग में जलती हुईं।
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में बड़े पल अचानक आते हैं—जैसे दूल्हा। तैयारी न करने वाले खाली हाथ रह जाते हैं, जबकि जो सतर्क रहते हैं, वे आनंद में भागीदार बनते हैं। इसलिए, हमेशा जागते रहो, क्योंकि वह घड़ी कौन जानता है?
दस कुंवारियों की दृष्टान्त (मत्ती 25:1-13, हिंदी बाइबल – BSI)
स्वर्ग का राज्य उन दस कुंवारियों के समान है जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं। उनमें से पांच मूर्ख थीं और पांच समझदार।
मूर्खों ने अपनी मशालें तो लीं, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया। लेकिन समझदारों ने अपनी मशालों के साथ अपनी कुप्पियों में तेल भी भर लिया।
जब दूल्हे के आने में देरी हुई, तो वे सब ऊंघने लगीं और सो गईं। आधी रात को धूम मचने लगी: “देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिए चलो!”
तब वे सब कुंवारियां उठीं और अपनी-अपनी मशालें ठीक करने लगीं। मूर्खों ने समझदारों से कहा, “अपने तेल में से कुछ हमें भी दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझने लगी हैं।”
लेकिन समझदारों ने उत्तर दिया, “कदाचित हमारे और तुम्हारे लिए पर्याप्त न हो। बेहतर यही है कि तुम व्यापारियों के पास जाकर अपने लिए तेल खरीद लो।”
जब वे तेल खरीदने गईं, तभी दूल्हा आ पहुंचा। जो तैयार थीं, वे उसके साथ विवाह भवन में चली गईं, और द्वार बंद कर दिया गया।
बाद में शेष कुंवारियां आकर बोलीं, “हे प्रभु, हे प्रभु, हमारे लिए द्वार खोल दो!”
लेकिन उसने उत्तर दिया, “मैं सच्चाई से कहता हूं, मैं तुम्हें नहीं जानता।”
इसलिए जागते रहो, क्योंकि उस दिन और उस घड़ी को तुम नहीं जानते।

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