मूसा और इस्राएलियों की मिस्र से कनान यात्रा
यह वृत्तांत इस्राएलियों के मिस्र में दासता से शुरू होकर, उनके जंगल में 40 वर्षों के भटकाव और अंत में प्रतिज्ञा किए हुए देश कनान तक पहुँचने का वर्णन करता है।
प्रथम चरण: मिस्र में दासता और मूसा का आह्वान
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मिस्र में दासता (गुलामी): इस्राएल के लोग (याकूब/इस्राएल की संतानें) सैकड़ों वर्षों से मिस्र में दासता का जीवन जी रहे थे और फ़िरौन (Pharaoh) के अधीन कठोर परिश्रम कर रहे थे।
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मूसा का जन्म और पलायन: मूसा का जन्म तब हुआ जब फ़िरौन ने सभी इस्राएली नर शिशुओं को मारने का आदेश दिया था। वह जीवित बचे और फ़िरौन की बेटी द्वारा पाले गए। बड़े होकर एक मिस्री को मारने के बाद, मूसा मिद्यान देश भाग गए।
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जलती झाड़ी (Burning Bush) से आह्वान: मिद्यान में, मूसा ने एक जलती हुई झाड़ी देखी जो भस्म नहीं हो रही थी। परमेश्वर ने उस झाड़ी से मूसा को दर्शन दिए और उन्हें मिस्र लौटने और अपने लोगों को दासता से बाहर निकालने का आदेश दिया।
दूसरा चरण: मिस्र से निर्गमन (The Exodus)
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फ़िरौन के साथ टकराव: मूसा अपने भाई हारून (Aaron) के साथ मिस्र लौटे और फ़िरौन से इस्राएलियों को जाने देने के लिए कहा। फ़िरौन ने मना कर दिया।
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दस विपत्तियाँ (Ten Plagues): फ़िरौन के बार-बार मना करने पर, परमेश्वर ने मिस्र पर दस भयानक विपत्तियाँ भेजीं (जैसे पानी का खून में बदलना, टिड्डियाँ, अंधकार)।
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पहलूठों का वध और फसह (Passover): दसवीं और अंतिम विपत्ति में, मिस्र के सभी पहलौठे पुत्र मारे गए। इस्राएलियों ने परमेश्वर के निर्देशानुसार फसह (Passover) का पर्व मनाया और अपने दरवाजों पर मेम्ने का खून लगाया, जिसके कारण वे मृत्यु से बच गए।
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मिस्र से प्रस्थान: इस अंतिम विपत्ति के बाद, भयभीत फ़िरौन ने इस्राएलियों को तुरंत मिस्र छोड़ने का आदेश दिया। लगभग 6 लाख पुरुष (और उनके परिवार) मिस्र से निकल पड़े।
तीसरा चरण: लाल सागर पार करना और जंगल की यात्रा
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लाल सागर (Red Sea) का विभाजन: जब इस्राएली लाल सागर के किनारे पहुँचे, तो फ़िरौन पछताया और अपनी सेना के साथ उनका पीछा करने लगा। परमेश्वर ने मूसा के द्वारा लाल सागर को दो भागों में बाँट दिया, जिससे इस्राएली सूखी ज़मीन पर चलकर पार हो गए। जैसे ही मिस्री सेना ने पीछा किया, परमेश्वर ने समुद्र के पानी को वापस मिला दिया और वे सब डूब गए।
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जंगल में भटकाव (The Wilderness): इस्राएली अब सिनाई (Sinai) के विशाल और सूखे रेगिस्तान में थे। उनकी यात्रा 40 वर्ष तक चली।
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भोजन और पानी का प्रबंध: जंगल में लोगों ने भूख और प्यास की शिकायत की। परमेश्वर ने उन्हें आकाश से मन्ना (Manna) नामक भोजन और बटेर (Quail) का मांस दिया, और मूसा के द्वारा चट्टान से पानी निकाला।
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सिनै पर्वत पर व्यवस्था: इस्राएलियों ने सिनै पर्वत के पास डेरा डाला। वहाँ, मूसा पर्वत पर गए और परमेश्वर ने उन्हें दस आज्ञाएँ (Ten Commandments) और सारी व्यवस्था दी, जो इस्राएलियों के लिए कानून बनी।
चौथा चरण: प्रतिज्ञा किए हुए देश के द्वार पर
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सोने का बछड़ा: जब मूसा व्यवस्था लेने के लिए पर्वत पर थे, तो लोगों ने हारून पर दबाव डाला और सोने का एक बछड़ा बनाकर उसकी पूजा की। इससे परमेश्वर क्रोधित हुए, और मूसा को लोगों के लिए विनती करनी पड़ी।
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कनान की टोह: मूसा ने कनान देश की टोह लेने के लिए 12 जासूसों (Spies) को भेजा। उनमें से 10 जासूसों ने भयभीत होकर बताया कि देश के निवासी विशालकाय हैं और वे उन्हें हरा नहीं सकते। केवल यहोशू (Joshua) और कालेब (Caleb) ने विश्वास की रिपोर्ट दी।
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40 वर्ष का दण्ड: जासूसों की अविश्वास भरी रिपोर्ट के कारण, परमेश्वर ने पूरी पीढ़ी को जंगल में 40 वर्ष तक भटकने का दण्ड दिया। केवल यहोशू और कालेब ही उस नई पीढ़ी के साथ कनान में प्रवेश करने वाले थे।
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मूसा की मृत्यु: जंगल के भटकाव के अंत में, जब इस्राएली कनान के पास मोआब के मैदानों में थे, तो मूसा को नेबो पर्वत (Mount Nebo) पर ले जाया गया। वहाँ से मूसा ने प्रतिज्ञा किए हुए देश कनान को दूर से देखा, लेकिन परमेश्वर के आदेशानुसार वह उसमें प्रवेश नहीं कर सके।
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यहोशू का नेतृत्व: मूसा की मृत्यु के बाद, उनके सेवक यहोशू ने इस्राएलियों का नेतृत्व संभाला और उन्हें यरदन नदी (Jordan River) पार करवाकर आखिरकार कनान देश में प्रवेश कराया।
