पवित्र शास्त्र (बाइबल) के अनुसार, यीशु मसीह के क्रूसीकरण की घटना को यहाँ निम्नलिखित चरणों में प्रस्तुत किया गया है। यह मानवता के पापों के लिए यीशु के महान बलिदान को दर्शाता है:
क्रूसीकरण से पहले की घटनाएँ
विश्वासघात और गिरफ्तारी: फसह के पर्व के समय, यीशु के बारह चेलों में से एक, यहूदा इस्करियोती, ने चांदी के तीस सिक्कों के बदले में यीशु को धोखा दिया। यीशु को यरूशलेम के बाहर गतसेमनी नामक बगीचे में रोमन सैनिकों और महायाजकों के सेवकों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।
धार्मिक और नागरिक जाँच:
पहले, यीशु को यहूदी धार्मिक नेताओं (महायाजकों और महासभा) के सामने लाया गया, जिन्होंने झूठी गवाहियों के आधार पर उन पर ईशनिंदा (Blasphemy) का आरोप लगाया।
चूँकि यहूदियों को मृत्युदंड देने का अधिकार नहीं था, इसलिए उन्हें रोमन गवर्नर पुन्तियुस पीलातुस के पास भेजा गया।
पीलातुस को यीशु में कोई दोष नहीं मिला, लेकिन भीड़ के लगातार दबाव और संभावित विद्रोह के डर से, उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए सौंप दिया।
दण्ड और अपमान: रोमन सैनिकों ने यीशु को बुरी तरह कोड़े मारे (Scourging)। उनका मज़ाक उड़ाया गया, उन्हें बैंगनी रंग का एक वस्त्र पहनाया गया, और उनके सिर पर काँटों का एक ताज रखा गया।
क्रूसीकरण के मुख्य चरण
क्रूस उठाना और गोलगोथा तक यात्रा: यीशु को अपना ही भारी क्रूस (Cross) उठाकर नगर से बाहर गोलगोथा (जिसका अर्थ ‘खोपड़ी का स्थान’ है) नामक पहाड़ी तक जाना पड़ा। अत्यधिक दुर्बलता के कारण, रास्ते में एक व्यक्ति, शमौन कुरैनी को क्रूस उठाने में उनकी सहायता करने के लिए मजबूर किया गया।
क्रूस पर चढ़ाना: गोलगोथा पहुँचकर, यीशु को उनके वस्त्रों से अलग किया गया और उन्हें दो अपराधियों (एक उनके दाईं ओर और एक बाईं ओर) के बीच क्रूस पर कीलों से ठोक दिया गया। उनके सिर के ऊपर एक तख्ती लगाई गई, जिस पर लिखा था: “यहूदियों का राजा, यीशु नासरी।”
क्षमा और वचन: क्रूस की असहनीय पीड़ा में भी, यीशु ने अपने सताने वालों के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।” उन्होंने क्रूस पर से सात महत्वपूर्ण वचन कहे।
अंधकार और अंतिम क्षण: दोपहर 12 बजे से दोपहर 3 बजे तक, पूरे देश में गहरा अँधेरा छा गया। लगभग तीन घंटे बाद, यीशु ने अंतिम शब्द कहे, “पूरा हुआ!” और उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया।
मृत्यु के बाद के संकेत
मंदिर का पर्दा फटना और भूकंप: यीशु की मृत्यु के तुरंत बाद, यरूशलेम के मंदिर में वह भारी पर्दा, जो परम पवित्र स्थान को अलग करता था, ऊपर से नीचे तक फट गया। ज़मीन हिल गई और भूकंप आया। रोमन सूबेदार, जिसने यह सब देखा, उसने कहा, “निश्चय ही यह परमेश्वर का पुत्र था।”
दफन: सूर्यास्त से पहले, अरिमतियाई यूसुफ नामक एक धनी व्यक्ति ने पीलातुस से यीशु का शव मांगा। यीशु के शरीर को क्रूस से उतारा गया और एक साफ कफ़न में लपेटकर एक नई कब्र में रखा गया।
यीशु का यह बलिदान मानवजाति को पापों की क्षमा और परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप का मार्ग प्रदान करता है, जिसका पूर्ण समापन तीसरे दिन उनके पुनरुत्थान के साथ हुआ।
यीशु मसीह का पुनरुत्थान
क्रूसीकरण के बाद, यीशु मसीह को अरिमतियाई यूसुफ की नई कब्र में दफनाया गया था। यहूदियों के धार्मिक नेताओं के अनुरोध पर, पीलातुस ने कब्र पर मोहर लगाने और रोमन सैनिकों द्वारा उसकी चौकसी (Guard) करने का आदेश दिया, ताकि कोई भी उनके शरीर को चुरा न सके।
पुनरुत्थान के मुख्य चरण
सब्त (Sabbath) का अंत: क्रूसीकरण शुक्रवार को हुआ था, और शनिवार (सब्त) को धार्मिक विश्राम था, इसलिए कोई काम नहीं किया गया।
पहला प्रभात (रविवार): सप्ताह के पहले दिन, भोर के समय, कुछ स्त्रियाँ (जिनमें मरियम मगदलीनी भी शामिल थीं) यीशु के शरीर पर लगाने के लिए सुगन्धित मसाले लेकर कब्र पर गईं।
कब्र खाली मिलना: जब वे कब्र पर पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि वह विशाल पत्थर जो कब्र के द्वार पर लगा था, लुढ़क चुका है। सैनिक गायब थे।
स्वर्गदूत का संदेश: स्त्रियों ने देखा कि कब्र खाली है। कब्र के भीतर, उन्हें एक या दो स्वर्गदूत दिखाई दिए, जिन्होंने उन्हें बताया, “तुम जीवित को मरे हुओं में क्यों ढूँढ़ती हो? वह यहाँ नहीं है, परन्तु जी उठा है।” स्वर्गदूतों ने उन्हें याद दिलाया कि यीशु ने अपनी मृत्यु से पहले ही भविष्यवाणी की थी कि वह तीसरे दिन जी उठेंगे।
शिष्यों को खबर: स्त्रियाँ डर और खुशी से भरकर यीशु के शिष्यों को यह बताने के लिए दौड़ीं। शुरू में, शिष्यों ने उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया।
पतरस और यूहन्ना का दौड़ना: यह सुनकर, पतरस और यूहन्ना (शिष्य) तुरंत कब्र पर पहुँचे। उन्होंने देखा कि कब्र खाली है और यीशु को लपेटने वाले कफ़न के वस्त्र एक तरफ़ करीने से पड़े हुए हैं। यूहन्ना ने देखा और विश्वास किया।
मरियम मगदलीनी को दर्शन: यीशु सबसे पहले मरियम मगदलीनी के सामने प्रकट हुए। जब मरियम ने उन्हें माली समझकर बात की, तब यीशु ने उसका नाम लिया। उन्हें पहचानकर मरियम ने कहा, “रब्बोनी” (अर्थात, हे गुरु)।
पुनरुत्थान के बाद के चालीस दिन: पुनरुत्थान के बाद, यीशु चालीस दिनों तक पृथ्वी पर रहे। इस दौरान वह अपने चेलों और पाँच सौ से अधिक लोगों के समूह को दिखाई दिए, यह प्रमाणित करने के लिए कि वह वास्तव में जी उठे हैं। उन्होंने अपने चेलों को महान आज्ञा (Great Commission) दी कि वे जाकर सारे संसार में सुसमाचार का प्रचार करें।
पुनरुत्थान ईसाइयों के लिए विजय का प्रतीक है, यह साबित करता है कि यीशु सचमुच परमेश्वर के पुत्र थे और उन्होंने मृत्यु और पाप की शक्ति को हमेशा के लिए तोड़ दिया।
