यरूशलेम के बाहरी किनारों पर, एक प्राचीन अंजीर का पेड़ था। वह केवल लकड़ी और पत्तियों का ढेर नहीं था, बल्कि समय का गवाह था। उसने सुना था कि उसके पत्ते कितने महत्वपूर्ण थे, जब बहुत पहले, मनुष्य ने अपनी नग्नता को ढकने के लिए उन्हीं का सहारा लिया था। उत्पत्ति 3:7 में लिखा है: … Continue reading “The Story of the Fig Tree”
I. अपरिमेय स्वर्गीय सेना: बाइबिल में स्वर्गदूतों की संख्या (देवदूतों की संख्या) A. संख्या का विरोधाभास: असंख्य बनाम नामित बाइबिल में उल्लेखित स्वर्गदूतों की संख्या संबंधी मूल प्रश्न के लिए यह समझना आवश्यक है कि कुल स्वर्गीय प्राणियों की संख्या और उन चुनिंदा स्वर्गदूतों में अंतर है जिनके नाम स्पष्ट रूप से दिए गए हैं। … Continue reading “Analysis of angels in biblical traditions”
पवित्र शास्त्र (बाइबल) के अनुसार, यीशु मसीह के क्रूसीकरण की घटना को यहाँ निम्नलिखित चरणों में प्रस्तुत किया गया है। यह मानवता के पापों के लिए यीशु के महान बलिदान को दर्शाता है: क्रूसीकरण से पहले की घटनाएँ विश्वासघात और गिरफ्तारी: फसह के पर्व के समय, यीशु के बारह चेलों में से एक, यहूदा इस्करियोती, … Continue reading “Crucifixion and Resurrection of Jesus Christ”
सदोम और अमोरा का विनाश (बाइबिल के अनुसार) सदोम (Sodom) और अमोरा (Gomorrah) दो ऐसे शहर थे जो जॉर्डन घाटी में स्थित थे। बाइबिल के अनुसार, ये शहर अपनी अत्यधिक दुष्टता और अनैतिकता के लिए प्रसिद्ध थे, और उनके निवासियों के पापों की आवाज़ परमेश्वर तक पहुँच चुकी थी। अब्राहम की मध्यस्थता परमेश्वर ने अपने … Continue reading “The Story of the Destruction of Sadom and Amorrah”
1. पृथ्वी पर दुष्टता और नूह की धार्मिकता बाइबिल बताती है कि नूह के समय में, पृथ्वी पर लोग बहुत दुष्ट और भ्रष्ट हो गए थे। हर जगह हिंसा और पाप फैल गया था, और परमेश्वर ने मनुष्यों को बनाने पर खेद महसूस किया। हालाँकि, नूह ही एकमात्र व्यक्ति था जो धर्मी था और … Continue reading “The Story of Noah and the Flood”
दस कुंवारियों की कहानी बहुत पुरानी बात है, एक छोटे से गाँव में जहां फूलों की महक और मधुर संगीत की ध्वनियाँ हवा में घुली रहती थीं, एक शानदार विवाह का उत्सव होने वाला था। दूल्हा, एक राजकुमार जैसा युवक, जो सबकी नजरों का केंद्र था, अपनी दुल्हन के लिए आ रहा था। लेकिन वह … Continue reading “The Parable of the Ten Virgins (Mathew 25:1-13)”
